अज़का : इक नई दास्तान
कुछ रातें कैलेंडर की तारीख़ नहीं होतीं। वो मुकद्दर की किताब में सुनहरे हरूफ़ों से लिखी जाती हैं। 27 जनवरी 2025 की रात, जब रामीन ने पहली बार अपनी आँखें खोली थीं, तब मुझे लगा था कि शायद मेरी झोली में आने वाली हर ख़ुशी पूरी हो चुकी है। उस दिन मैंने पहली बार जाना था कि किसी नन्हें से हाथ का उँगली थाम लेना, पूरी दुनिया जीत लेने से कहीं ज़्यादा बड़ी नेमत होती है। मगर शायद ख़ुदा मुस्कुरा रहा था… क्योंकि उसकी रहमत अभी पूरी कहाँ हुई थी! वक़्त गुज़रा… रामीन की खिलखिलाहटों ने घर की दीवारों को बोलना सिखा दिया। उसके छोटे-छोटे कदमों ने हर कमरे में खुशियाँ बिखेर दीं। उसकी मुस्कान हमारे हर ग़म पर मरहम बन गई। और फिर… एक दिन हमें पता चला कि ख़ुदा ने हमारी झोली में एक और दुआ रख दी है। उस दिन से घर में सिर्फ़ इंतज़ार नहीं था… हर दिन एक नई उम्मीद थी। रामीन को देखकर अक्सर दिल कहता— मेरी बच्ची… बहुत जल्द तुम्हारे साथ खेलने वाली तुम्हारी बहन आने वाली है। फिर वो दिन भी आ गया… अस्पताल का माहौल… सफ़ेद दीवारें… धीरे-धीरे चलती घड़ी… इंतज़ार में डूबी निगाहें… बेचैन साँसें… लबों पर दुआ… और दिल में बस एक ही नाम! बस इ...