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Showing posts from November, 2021

ख्वाजा प्यारे नात

ख्वाजा प्यारे की महफिल सजा के जश्न उनका मनाते रहेंगे.  रास आयी उनकी गुलामी दर पे पलकें बिछाते रहेंगे.  लाए तशरीफ अजमेर ख्वाजा लगा सागर पे राजा का पहरा,  इन्हें पानी का कतरा मयस्सर ना हो लोग आते व जाते रहेंगे.  तेवर बातिल के बदले हुए देखकर हुक्म काशा को ख्वाजा ने दे ही दिया,  आया कूजे मे है सारा पानी खुद पियेंगे पिलाते रहेंगे.  बारिश की आतिशों की जयपाल ने बाल बीका हुआ ना किसी का,  जूतियां सर चढीं तौबा करके कहा दर का रस्ता दिखाते रहेगें.  किस कदर है हसीं आज मंजर हर नजर मे बसा सब्ज गुंबद,  इस अजमेर की सरजमीं पर मांगते और पाते रहेंगे.  हैं शाह व गदा सब ही यक्शां सर झुकाते हैं चौखट पे आके.  पलक झपकते ही पूरी हो दिल की तमन्ना झोली भर लो दिलाते रहेंगे.  नात की ही बदौलत ऐ 'मुफ़लिस' उनके दर की मिली है गुलामी,  परचम सरकार ख्वाजा उठा के याद ताजा कराते रहेगें.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

है मझधार नात

है मझधार मे सफ़ीना जिए जा रहा हूं मैं,  पैगाम मुहब्बत का दिए जा रहा हूं मैं.  जिंदगी मे आए नशेबो फराज अक्सर,  माहौल से मिलाप किए जा रहा हूं मैं.  अपनों से ना शिकायत गैरों से ना गिला,  लब खुद ही अपने हाथों सिए जा रहा हूं मैं.  अल्लाह रे तेरी शान निराली है बेमिसाल,  बुझता चराग सहर लिए जा रहा हूं मैं.  गुनहगारों के सहारे हैं सरकार ऐ 'मुफ़लिस' इस उम्मीद पे भरोसा किए जा रहा हूं मैं.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

गुलामों की नात

गुलामों की सफों मे हजरते यूसुफ का नाम आया,  उधर जोशे जुनूं मे खुद ज़ुलैख़ा का पयाम आया.  बिला ताखीर यूसुफ को बुलाया महल के अंदर,  ना कोई चाल हर बा हजरते यूसुफ के काम आया.  खुदा साबित कदम रक्खे उठे हैं दस्त यूसुफ के,  हमारे नफ्स की अब आजमाइश का मकाम आया.  ना छूटा कैद मे भी सब्र व इसतकलाल का दामन,  नवाजह रब ने ऐ 'मुफ़लिस' जेरे कदम शाही निजाम आया.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

रहमत की नात

रहमत की किरन फैली सरकार आ गए हैं,  तारीकियाँ हैं सिमटी ताज़दार आ गए हैं.  ख़म हो गया है काबा ताजीम ए मुस्तफा मे,  बुत भी पड़े हैं औंधे सय्यदे इबरार आ गए हैं.  वक्ते जहूर आक़ा बू जहल था परीशाँ,  मलता रहा हथेली गम गुसार आ गए हैं.  आक़ा की कदम बोशी को हाजिर थे फरिश्ते,  जिबरीले अमीं फरिश्तों के सरदार आ गए हैं.  'मुफ़लिस' तेरी किस्मत का चमकेगा सितारा,  उम्मतियों के लिए जन्नत के मुख्तार आ गए हैं.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

अल्लाह के कुदरत नात

अल्लाह के कुदरत के आइना थे मुस्तफा,  हर दिल अजीज और सब के सहारे थे मुस्तफा.  आए थे उमर कत्ल को ले के शमशीर बरहना,  अपना बना के उनको कलमा पढ़ाए थे मुस्तफा.  हाजत थी सख्त पानी की परीशां थे सहाबा,  अंगुस्त को ही दरिया बनाए थे मुस्तफा.  शजर व हजर ताजीम मे खम होते बा अदब,  जिस सिम्त व जिस जा से निकलते थे मुस्तफा.  सारे सहाबी और हुजूर दावते जाबिर मे आए थे,  बच्चों को जिला के 'मुफ़लिस' शिकम सेर खिलाए थे मुस्तफा.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

दोशंबा की नात

दोशंबा की सुबह सादिक नबी तशरीफ लाए थे.  ज़माने मे अंधेरा था उजाला साथ लाए थे, नयी सुबह लाए थे जिंदगी दिलाए थे दुनिया के सामने.  मासूम जिंदा बच्चियों को सुपुर्द ए खाक करते थे,  उनकी मिन्नत व माजरत नज़र अंदाज करते थे,  नया सवेरा लाए थे बेटियाँ बचाए थे दुनिया के सामने.  गुमराही उरुज पे थी हावी हो गया था शैतां,  उसके नक्शे कदम पे चलके गुमराह हुआ इंसां, नयी रोशनी लाए थे गुमराही मिटाए थे दुनिया के सामने.  नफरत व जहालत शबाब पे थी जीना मुहाल था,  मुफ़लिस' रास्ते खौफनाक थे चलना मुहाल था, नया दौर लाए थे बद अमनी मिटाए थे दुनिया के सामने.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

गुनहगारों की नात

गुनाहगारों की तू इल्तिजा सुन ले या रब, है नेदामत की तौबा कबूल कर ले या रब. इस्लामी तालीम है उरुज पर मगर, उन्हें तौफीक अमल का हौसला दे दे या रब.  मस्जिदें तो बहुत हैं पर नमाजी नहीं,  सज्दों की तड़प सीने मे उनके बसा दे या रब.  अजब है नहीं ग़ज़ब आए किधर से,  उस आफत बला से बचाना ऐ या रब.  जरूरत है दे आज मरदे मुजाहिद,  जो किरदार बेलाली अदा करदे या रब.  गफलत की नींद ग़ालिब गाफिल है मुसलमां,  'मुफ़लिस' की मुद्दुआ है बेदार कर दे या रब.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

जेबतन कर लिया नात

जेबतन कर लिया जामे तकवा मगर,  निगह पैनी मे आते हो नंगे नजर.  बातिल को जाहिर के रंग मे रंगों,  होगी आसां बहुत आखिरत की डगर.  जिंदगी मे दखल नफ्स नाकिस ना हो,  ईमां वालों पे पड़ता ना इसका असर.  अल्लाह वालों के नक्शे कदम पर चलो,  आकबत होगी रौशन मिले मीठा समर.  अफजल मखलूक का हक अदा तो करो,  सजदा करते नजर आते शम्स व कमर.  तकब्बुर रिया से बचो ता उमर,  कामयाबी का 'मुफ़लिस' है बेहतर हुनर.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

सब्र की नात

सब्र की तलकीन करता है खुदा,  कुरआन में ताकीद आयी बारहा.  सब्र तकवा का है लाजमी जुज, सब्र पर राजी खुदा उसकी रज़ा.  अक्ल जायल करता है गुस्सा हराम,  सब्र ही जिसका बदल होता सदा.  मुश्किलों मे सब्र बन जाता है ढ़ाल,  फर्ज खुश असलूवी से करता है अदा.  सब्र का दामन तू भी 'मुफ़लिस' थाम ले,  सूरते वल अश्र करती है नेदा.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

बुराई करने नात

बुराई करने वालों का बुरा अंजाम होता है,  शक़्ल इंसान मे शैतानियत का काम होता है.  मौत आने से पहले ही मिजाज अपना बदल डालो,  भलाई और नेकी का खुदा पैगाम देता है.  ये दुनिया जा-ए-इबरत और नसीहत की जगह भी है,  जिसने सीख ली इससे उसी का नाम होता है.  इंसां की जिंदगी मिस्ले हुबाब है,  ना समझी अहमियत जिसने 'मुफ़लिस, वही नाकाम होता है.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

जिस दिल से नात

जिस दिल से अल्लाह की अजमत चली गई, कितना है बदनसीब वो जन्नत चली गई. निस्बत दिली नहीं जिसे आले रसूल से,  कर ले यकीन नादां रहमत चली गई.  मेहमानों के आने से हुई रिज्क मे बरकत,  एहसास कमतरी की वहशत चली गई.  किरदार है इंसा का अतवार पे मुबनी,  अख़लाक़ से गिरा तो ग़ैरत चली गई.  'मुफ़लिस' अगर पीना है तो खाने खुदा मे पी,  इक बार अगर पी ली तो गफलत चली गई.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

खुद के साये नात

खुद के साये की तरह छाई ये दुनिया हम पर, जहन माऊफ़ कर डाला और हावी हो गए हम पर. मैं उलझा इस तरह कि उलझने बढ़ती गयीं मेरी, निभाने की कसम खाती और डोरे डालती हम पर.  दीन ईमां बन चुकी नादानी मे फानी दुनिया, अगर तौबा ना की तो सजा वाजिब हुई हम पर.  ये हरजाई है नंबर वन भरोसा मत करो इस पर,  ये जालिम छा ही जायेगी कभी तुम पर कभी हम पर.  इलाही कर अता अक्ले सलीम इस नादान 'मुफ़लिस' को,  कि मिट जाए गलतफहमी व गफलत का असर हम पर.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

किसी सिद्दीक नात

किसी सिद्दीक को नारे जहन्नुम छू नहीं सकती,  जो सादिक हैं कभी उनको निदामत छू नहीं सकती.  अमल सच्चा जहन सच्चा है तन बदन सच्चा,  सदाकत ही अमानत है ख़यानत छू नहीं सकती. सेराते मुस्तकीम से हट रही है कौमे मुस्लिम,  अगर रब ने हिदायत दी हिमाकत छू नहीं सकती.  अगर इंसान हो तो इंसानियत को जेबतन कर लो,  शराफत कदम चूमेगी ज़लालत छू नहीं सकती.  सलीका सीख लो 'मुफ़लिस' हक़ परस्ती का,  हकीकत रास आएगी हिकारत छू नहीं सकती.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

दिरसे कुरआं नात

दिरसे कुरआं मिला हमको मुहम्मद के घराने से,  शरियत पा गयी परवान आँगन मे सिखाने से.  मुहम्मद के वसीले से हुई पहचान खालिक की,  वो होगी दूर गुमराही जो पनपी इक ज़माने से.  ये है ऐलान कुरआं का मजहबे इस्लाम सच्चा है,  सबक नायाब मोमिन को मिला रब के बताने से.  अजल से ता अजल दुश्मने दीं हो गया शैतां,  कयामत तक ना बाज आएगा वो वरगलाने से.  अमल सालेह ही काम आएगा 'मुफ़लिस' मैदाने महशर मे,  जो बहका बच नहीं सकता है वो दोज़ख मे जाने से.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

आसताने नबी नात

आसताने नबी देखते रह गए,  उसके दीवार व दर देखते रह गए.  तलब कर ही लिया बेसहारों को है,  हुआ नजरे करम देखते रह गए.  आंखे खुली तो खुलीं रह गयीं,  दीवानापन देखिए देखते रह गए.  गुंबदे खजरा का साया ना आया नजर,  नजरे उठती रहीं देखते रह गए.  करम फरमा हैं मेरे शाहे उमम,  'मुफ़लिस' कोई खाली ना लौटा देखते रह गए.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

रब की रचाई नात

रब की रचाई दुनिया पे एहसाने मुस्तफा है  हर रूह के मसीहा ये आने मुस्तफा है.  दश्त उटठे सूरज पलटा चांद दो टुकड़े हुआ,  हर शै पे है हुकूमत ये शाने मुस्तफा है.  अदना सी इक करामत पे अंगुस्त बनी चश्मा,  सैराब हुए प्यासे ये फैजाने मुस्तफा है.  बू जहल ने पूछा मुट्ठी मे मेरे क्या है,  कंकर ने पढ़कर कलमा कहा ये पहचाने मुस्तफा है.  अर्शे बरीं पे पहुंचे दीदार मुहिब आक़ा,  'मुफ़लिस' सौगात मे नमाज मिली जो ईमाने मुस्तफा है.    - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

सदके में मुस्तफा कतआ

सदके मे मुस्तफा के तखलीक खल्क कर दी,  पुतला बना के मिट्टी का इंसानी शक्ल दे दी.  तन्हाई के ख्याल से आयीं वज़ूद मे हौव्वा,  तुरफैन को खालिक ने जन्नत मे जगह दे दी.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

खारों के कतआ

खारों के झुरमुट मे नशीमन है गुलों का,  चुभते हैं बे दरेग लहू पीते गुलों का.  शिकवा है ना गिला है सब्र पे तकिया,  अपना ले तू भी 'मुफ़लिस' किरदार गुलों का.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

हश्र के मैदां कतआ

हश्र के मैदां मे मजमए आम है,  आज फितरते इंसान भी नाकाम है.  रहमते खालिक पे है सबकी नजर 'मुफ़लिस'  जबकि सब के हाथों मे खुला अंजाम है.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

महशर की तमाजत नात

महशर की तमाजत के मंज़र अजीब होंगे,  मुरझाए हुए चेहरों के आक़ा तबीब होंगे.  अलम के साये तले रंज के मारे होंगे,  मिल जायेंगे सरकार जिनके नसीब होंगे.  मायूस होके लौटे हर नबी के दर से,  ये नजरे तलाश लेंगी जिस जा हबीब होंगे.  नफ्सी नफ्सी होगी पड़ी आमाल नामा दस्त मे,  यही आमाल नामे 'मुफ़लिस' रफीक व रकीब होंगे.  बाबे मीजां पे गुनाहगार परेशां होंगे,  बिला तफरीक होगा अज्ल अमीर व गरीब होंगे.  रब्बे हब्ली कहते नबी मीजान पे,  बख़्शिश करा के रब से खुद भी करीब होंगे.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

जहां जिक्र ए रसूल कतआ

जहां जिक्र ए रसूल होता है,  रहमतों का नुजूल होता है.  पढ़िए पढ़िए दरूद पाक पढ़िए,  जो बारगाहे रिसालत कबूल होता है.  शब की बेदारी का ज़ज्बा देखकर,  'मुफ़लिस' शैतां मलूल होता है.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

नाज़ 'मुफ़लिस' को नात

नाज़ 'मुफ़लिस' को है मुफ़लिसी पे मगर,  मालो जर पे है अपना भरोसा नहीं.  इस अंबार दौलत पे नाजाँ ना हो,  कब ये आयी गई कुछ भरोसा नहीं.  अमीरी गरीबी का मजबूत रिश्ता,  किसे क्या मिले कुछ भरोसा नहीं.  गई कारून के साथ कौड़ी नहीं,  सब यहीं रह गया कुछ भरोसा नहीं.  आखिरत की है पूंजी अमल नेक 'मुफ़लिस' फरेब दुनिया महज है भरोसा नहीं.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

हुसैन आजम को नात

हुसैन आजम को कूफा बुला के,  की है वादा खिलाफी मिला के.  कर्बला की जमीं खूं की प्यासी,  जामे शहादत पिया मुस्करा के.  नाम इस्लाम जिंदा किया है,  सर को सजदे मे अपने कटा के.  हक़ व बातिल का तू फैसला कर,  जुल्म जालिम ना ढाया बुला के.  जगह जन्नत मे मखसूस पायी,  'मुफ़लिस' किया वादा नाना से निभा के.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

करम फरमा कतआ

करम फरमा करम कीजिए करम का ही सहारा है,  मिले हसनैन का सदका ये जानों तन तुम्हारा है.  हसन व हुसैन जन्नती दो फूल हैं मुफ़लिस,  सहारे बेसहारों के अकीदह ये हमारा है.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

है परवाज़ इंसां नात

है परवाज़ इंसां की ऊंची पर मिस्ले मुस्तफा नहीं,  जिबरीले अमीं के रुके कदम बचेंगे पर बाखुदा नहीं.  अब जाइए तन्हा हुजूर रब आपसे जुदा नहीं,  अर्शे बरीं तक गए मुहम्मद जहां किसी की रिसा नहीं.  गारे हेरा मे मिली नुबूव्वत नबी से कुछ भी छुपा नहीं, महबूब मुहिब मसरुर मगन बीच मे है खला नहीं.  महशर मे नवाजेगा खुदा नमाज जिनकी कजा नहीं,  'मुफ़लिस' पे है नजरे करम कोई शिकवा गिला नहीं.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

कुछ इस तरह नात

कुछ इस तरह हुसैन ने दिरसे वफा दिया,  जब कशमकशे राह पड़ी मुस्करा दिया.  आले रसूल की जरा अजमत को देखिए,  जिस जा झुकाया सर वहीं काबा बना दिया.  परवा ना की हुसैन ने तीर व तेग की,  वक्ते नमाज आया तो सर को झुका लिया.  सर देके राहे हक मे देखो हुसैन ने,  तेगों के साये मे हमे जीना सिखा दिया.  ताकत नहीं कलम मे जो लिखूं वस्फे हुसैन,  'मुफ़लिस' को राहे हक पे चलना सिखा दिया.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

शिद्दत से मुंतजिर कतआ

शिद्दत से मुंतजिर है अर्श पे खुदा, और तालिबे नियाज़ हैं सरकारे मुस्तफा. रब ने बुला लिया है मुहम्मद को अपने पास,  तोहफा दिया नमाज का करते रहें अदा - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

सज्दों के एवज नात

सज्दों के एवज फिरदौस मिले ये बात मुझे मंजूर नहीं, बेलौस इबादत करता हूं बन्दा हूं तेरा मजदूर नहीं.  मस्जिद हो या हो वीराना रब की इबादत लाजिम है,  सज्दों की जगह जुजखाने खुदा क्या हरजा उसका जहूर नहीं. फितरत के पुजारी होश मे आ इस दुनिया से रिश्ता टूटेगा,  रब जिसको चाहे जिस हाल मे रक्खे मुख्तार है वो मजबूर नहीं.  लुकमए अजल बनोगे 'मुफ़लिस' इस दाम से बचना नामुमकिन, आमाल की अपने पाओ सज़ा वो वक्त भी आना दूर नहीं. - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

बलंदी पे अलम नात

बलंदी पे अलम ख्वाजा पिया का है सफ़ीने मे, अकीदतमंद पाएं फैज हर दिन हर महीने मे.  ज़माने को मुअत्तर कर दिया और कर गए पर्दा,  महक वो आज भी बाकी है ख्वाजा के दफ़ीने मे.  जमीने हिंद पे हर सिम्त बिखरे हैं सितारे भी,  कमर के मिस्ल मखजन हैं वो राजस्थां के सीने मे.  गरीब नवाज का दर है अदब लाज़िम है हम सब पर,  जहन सहमा है गाफिल का बदन डूबा पसीने मे.  ये वो दरबार है जिससे कोई खाली नहीं लौटा,  नवाजह हर सवाली को कमी क्या है खजीने मे.  जिये जाता है 'मुफ़लिस' खेलता मौजे हवादिस से,  अकीदत का भरम रखलो तो आए लुत्फ जीने मे.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

दोजख़ की ना नात

दोज़ख की ना जन्नत की फिज़ा मांग रहा हूं,  सरकार की कुरबत की दुआ मांग रहा हूं.  हसनैन के सदके मे बुला लीजिए तैबा,  आक़ा तेरे निस्बत की सज़ा मांग रहा हूं.  मंगता हूं मांगता हूं दामन को पसारे,  कुछ भी नहीं रहमत की सिवा मांग रहा हूं.  शरमाया है मुफ़लिस का जिक्र व सजदा,  रब तेरी अकीदत की रज़ा मांग रहा हूं.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

बा हिजाब हुस्ने नात

बा हिजाब हुस्ने यूसुफ ना भाए, बे हिजाब उनको देखा ना जाए. चाह से ही निकलते बिके मिस्र मे,  बाद बिकने के क्यूँ हाय हाय.  गैर हालत हुई इक नजर मे,  सुकून जुलैखा को इक पल ना आए.  इश्क परवां चढा आम होता रहा,  चर्चा बन ही गया बिन बताए.  चाक दामन हुआ दर खुले खुद बखुद, दाग हसमत पे लगने ना पाए.  रुख से पर्दा हटा कट गयीं उंगलियां, मजहबीनों को कुछ ना सुझाए.  फन मुसव्विर की 'मुफ़लिस' नहीं इन्तेहा,  मिस्ल बे मिस्ल बनता ही जाए. - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

आज सुन्नत सेहरा

आज सुन्नते रसूल की तकमील हुई है, सेहरे से दो सितारों की तमसील हुई है.  ये शर्फ मिला सेहरे को नौशा के बदौलत,  चेहरे की जिया सेहरे मे तहलील हुई है.  हर सिम्त है अन्वार तजल्ली का इक समां,  नूरे नज़र के नूर की इक झील हुई है.  हरशू है महक और फिज़ायें हैं मुअत्तर,  बारात आज खुशियों मे सील हुई है.  वालिद के रूखे ताबां पे लोगों की नज़र है,  खुद उनके ही एहसास की तकमील हुई है.  अजीज व अकारिब नाजां व मगन हैं,  जिस खूबी से बारात की तसकील हुई है.  'मुफ़लिस' की मुददुआ है रहें साद व सलामत,  आज खालिक की रहमतों की तनजील हुई है.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

फेल नाकिस कतआ

फेल नाकिस पे गुजरी जिंदगी है,  मुह दिखाना हश्र मे शर्मिंदगी है.  सिवा मायूसी के हासिल नहीं कुछ, गो लगाया बारहा पाबन्दगी है.  अपने अतवार पे नादिम है 'मुफ़लिस' रहीमी पे नजर और बंदगी है.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

बज्म सरकार नात

बज्म सरकार सजाया तो बुरा मान गए,  नात महबूब सुनाया तो बुरा मान गए.  बुग्ज सीने का छुपाये ना छुपा,  जिक्र वालियों का जो आया तो बुरा मान गए.  आन वाहिद मे गए और लौटे,  हाल मैराज बताया तो बुरा मान गए.  मोमिन की जियाफत पे बातिल हुआ बरहना,  जाम कौसर जो पिलाया तो बुरा मान गए.  'मुफ़लिस' तेरे अशआर के अल्फाज़ मिस्ल तीर,  या मुहम्मद जो पुकारा तो बुरा मान गए.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

आगाज नए बाब नात

आगाज नए बाब का लायी सबा मदीने से,  फूटी रहमत की किरन बा खुदा मदीने से.  हुजूर आए तो जुलमत कदे मायूस हुए, तीरगी दूर हुई फैली जिया मदीने से.  अमीरो गरीब पाते हैं दर से तेरे,  मांगने वाले को मिलता सिवा मदीने से.  दीन मिल्लत के लिए नजदियत बना नासूर,  इलाही निकले नजदी वबा मदीने से.  हर शिफा खाने से अच्छी गली मदीने की, मरीज़ पाए दवा और शिफा मदीने से.  'मुफ़लिस' का मसगला है फकत नाते मुस्तफा,  रहे नसीब मे निस्बत सदा मदीने से.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

नक्श पा जब नात

नक्श पा जब मुहम्मद के पाने लगे,  नग्मे सरकार सब गुनगुनाने लगे.  सारा माहौल रौशन हुआ नूर से,  जब हबीबे खुदा मुस्कराने लगे.  देखकर रुखे जेबा पे ऐसी जिया,  चांद तारे सभी शर्म खाने लगे.  कंकरों ने भी मुट्ठी मे कलमा पढा,  बातिल दामन मे मुह को छुपाने लगे.  पूछा सिद्दीक क्या छोड़ आए हो घर,  बस खुदा और रसुल हैं बताने लगे.  रश्क 'मुफ़लिस' तू कर अपने अशआर पे,  बज्में सरकार पे आज छाने लगे.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

फर्श ता अर्श सेहरा

फर्श ता अर्श मची धूम आज सेहरे की,  दश्त नाजुक ने गूंधी है लड़ी सेहरे की.  बढ़ी जिबाइशे बारात हूर गुलमां से,  फ़लक पे रश्क है नौशाह तेरे सेहरे की.  मां व भाई बहन हैं मसरूर मगन,  जन्नती फूलों की लड़ियां हैं नौशाह तेरे सेहरे की.  दश्त शफकत जब उठे वालिद के हैं,  कैसे अंदाज से सरकी है लड़ी सेहरे की.  आदम व हव्वा की मुहब्बत कर अता तुरफैन मे,  'मुफ़लिस' की सुन ले यारब रह जाए लाज सेहरे की.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

अजमेर की धरती कतआ

अजमेर की धरती पे मजमए आम है,  बेहद हसीं और खुशनुमा ये शाम है.  ख्वाजा ख्वाजा कह रहा है हर बशर,  हर जुबां पे आज उनका नाम है.  बिला ताखीर हस्ब म मंसा मुराद मिलती है,  जायरो 'मुफ़लिस' का ये पैगाम है.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

गुलशने दीं नात

गुलशने दीं का ये जीशान बड़ा प्यारा है,  या नबी आपका फरमान बड़ा प्यारा है.  हुजूर आए तो कुरआने अजीम भी आया,  उन सहीफों मे ये कुरआन बड़ा प्यारा है.  यूँ तो सारे महीने हैं मुकद्दस लेकिन,  उन महीनों मे ये रमजान बड़ा प्यारा है.  जिस ने इस दौर मे ईमां की हिफाजत कर ली,  बा खुदा आज वो इंसान बड़ा प्यारा है.  दरे अकदस पे बा अदब जिबरील खड़े,  या नबी आपका दरबान बड़ा प्यारा है. हाजिरी देते हैं चौखट पे शाह व गदा,  मेरे अजमेर का सुल्तान बड़ा प्यारा है.  बज्म सरकार मे हाजिर हैं खास व आम मगर,  'मुफ़लिस' चारों खुलफाओं का ईमान बड़ा प्यारा है.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

जिसका सीना नात

जिसका सीना मखजने क़ुरआन है,  बेशक वो इंसां साहिबे ईमान है.  आसां नहीं है हाफिजे कुरआं होना,  बिलखुसूस ये मौजजे कुरआन है.  सब्र व इसतकलाल का दामन ना छोड़,  हर नसीबा का वही रहमान है.  जिंदगी अपनी सज्दों से सजा,  ये रसूलल्लाह का फरमान है.  छोड़ 'मुफ़लिस' तौर बातिल को अभी,  जिसका पैरो बे हया शैतान है.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

काली घटायें नात

काली घटायें आक़ा की जुल्फों के सामने,  सारे दिए हों जैसे शोआओं के सामने.  डूबा हुआ सूरज आ गया वापस,  मजबूर था आक़ा के इशारों के सामने.  हजरत बिलाल ने दी जब काबे मे अजां,  सानी ना हुआ उनके अज़ानो के सामने.  इक इशारे मे हुआ दो टुकड़े चांद,  उंगली उठी जो सब की निगाहों के सामने.  मारके बद्र बातिल का शर्मिन्दा ख्वाब था,  सर झुक गए हैं झूठे खुदाओं के सामने.  कातिल ना बन सके उमर साहिबे ईमान हो गए,  माजूर हो गए आक़ा के इरादों के सामने.  मुनकर नकीर कब्र मे हो जाएगें खामोश,  'मुफ़लिस' के बिला खौफ जवाबों के सामने  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

उनकी अजमत को क्या नात

उनकी अजमत को क्या बताना है, जिन पे कुदरत का शामियाना है.  मुन्तजिर बा अदब फरिश्ते खड़े, खास नालैन ही निशाना है.  फर्श से अर्श तक पहुंचे कदम,  कैसा अंदाज आशिकाना है.  मिल के बैठे महबूब व मुहिब,  जहां खालिक का आशियाना है.  लब कुशाई हुई जो मूसा से,  कहा अनमोल नमाजों का ये खजाना है.  नमाजे लाए और लेके गए,  कैसा मिलने का ये बहाना है  रब व अहमद मे इम्तियाज नहीं,  बारहा जाना और आना है.  हद से आगे ना बढ़ सके ज़िब्रील,  'मुफ़लिस' नाहक को पर जलाना है.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

अजमते मुस्तफा नात

अजमते मुस्तफा देखिए देखिए, लेने आया बुराक देखिए देखिए.  ताजीम मे फरिश्ते बा अदब खड़े,  दीद के मुन्तजिर देखिए देखिए.  परे जिबरील साया किए है,  बुराक इतरा रहा शोखपन देखिए देखिए.  महबूब व रब रूबरू हो गए,  अंदाजे गुफ़्तगू देखिए देखिए.  अर्श आजम पे मेराज आक़ा हुई,  ईद जैसा समां देखिए देखिए.  नमाजें लाए हुजूर मर्तबा बढ़ गया,  फ़रशे मेराज मोमिन हुआ देखिए देखिए.  रही कुंढी मे जुमबिश बिस्तर भी रहा गर्म,  'मुफ़लिस' वापसी हो गयी देखिए देखिए.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

ज़िक्र ए खुदा कतआ

ज़िक्र ए खुदा किया करो फरशे जमीन पर,  अल्लाह ज़िक्र करता है अर्शे अजीम पर.  ज़ाकिर का हुआ करता है मर्तबा बुलंद,  कुदरत का ये सिला है ज़िक्र ए अजीम पर.  अज्म व हिम्मत से काम ले 'मुफ़लिस'  नजर रख खालिक की शाने अजीम पर.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

सब्रो रजा सुकून नात

सब्रो रजा सुकून का जीना है बेहतरीन, रब का अता किया ये करीना है बेहतरीन. लाए तशरीफ आक़ा नाजिल हुआ कुरआं, जो इंसां की रहबरी का खजीना है बेहतरीन. हिफ्ज कुरआं किया साहिबे ईमां हुए, महफ़ूज़ कर लिया वो सीना है बेहतरीन.  हैं मुखतलिफ मजाहिब इस जहान मे, इस्लाम अपने आप मे नमूना है बेहतरीन.  बस्तियाँ बहुत हैं अरजे जमीन पे, 'मुफ़लिस' हर जा वो हर जगह से मदीना है बेहतरीन. - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

परवरदिगार मुफ़लिस दुआ

परवरदिगार 'मुफ़लिस' मुहताज है तुम्हारा, संभले मुकद्दर सबका हो जाए इक इशारा.  जिंदगी का सफर पुरखतर है मगर,  बेसहारों को सरकार देगें सहारा.  हैं मोहसिन वो ग़मख्वार आक़ा हमारे,  मुश्किलों मे उन्हें जब किसी ने पुकारा.  ज़िक्र ए खुदा हबीब है इंसां के लिए बस,  आसान होगी मंजिल है अकीदह हमारा.  दोनों जहां के मालिक बंदों पे तू नजर कर,  करदे अता तू इतना होता रहे गुजारा.  - मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस' मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

नाचीज़ आसमा के तले नात

नाचीज़ आसमा के तले नात पढ़ता रहा...  तखय्युल मे परवाज़ करता रहा. लोग आते रहे मजमा बढ़ता रहा, नारह अल्लाहु अकबर का लगता रहा.  नाचीज़ आसमा के तले नात पढ़ता रहा... पतिंगे परिंदे भी आने लगे,  अपनी आमद का अहसास कराने लगे.  खुशियों का इजहार करने लगे,  नग्मे सरकार सब गुनगुनाने लगे.  नाचीज़ आसमा के तले नात पढ़ता रहा...  रंग बिरंगी ख़ुशनुमा तितलियां आ गईं,  बज्म सरकार पे शामियाना बनीं.  अपने हुस्न की नुमाइश भी करने लगीं, अदब से झुकतीं और उड़ने लगीं.  नाचीज़ आसमा के तले नात पढ़ता रहा...  देखिये देखिए जुगनुवें आ गईं,  सारे माहौल पे कुमकुमा बन गईं.  रौशनी की बरसात करने लगीं,  जगमगाती रहीं और टिमटिमाती रहीं.  नाचीज़ आसमा के तले नात पढ़ता रहा...  खूबसूरत हसीं मोर भी आ गए,  पिव पिव की आवाज करने लगे.  रक्स करने लगे ठुमकी लगाने लगे, लोगों का दिल भी लुभाने लगे.  नाचीज़ आसमा के तले नात पढ़ता रहा... लोग अचम्भे मे थे करिश्मा चल पड़ा,  पतिंगों परिंदों का सिलसिला चल पड़ा.  मजमा सकते मे था इक समा बंध गया,...