है मझधार नात

है मझधार मे सफ़ीना जिए जा रहा हूं मैं, 
पैगाम मुहब्बत का दिए जा रहा हूं मैं. 

जिंदगी मे आए नशेबो फराज अक्सर, 
माहौल से मिलाप किए जा रहा हूं मैं. 

अपनों से ना शिकायत गैरों से ना गिला, 
लब खुद ही अपने हाथों सिए जा रहा हूं मैं. 

अल्लाह रे तेरी शान निराली है बेमिसाल, 
बुझता चराग सहर लिए जा रहा हूं मैं. 

गुनहगारों के सहारे हैं सरकार ऐ 'मुफ़लिस'
इस उम्मीद पे भरोसा किए जा रहा हूं मैं. 

- मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस'
मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

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