रहमत की नात
रहमत की किरन फैली सरकार आ गए हैं,
तारीकियाँ हैं सिमटी ताज़दार आ गए हैं.
ख़म हो गया है काबा ताजीम ए मुस्तफा मे,
बुत भी पड़े हैं औंधे सय्यदे इबरार आ गए हैं.
वक्ते जहूर आक़ा बू जहल था परीशाँ,
मलता रहा हथेली गम गुसार आ गए हैं.
आक़ा की कदम बोशी को हाजिर थे फरिश्ते,
जिबरीले अमीं फरिश्तों के सरदार आ गए हैं.
'मुफ़लिस' तेरी किस्मत का चमकेगा सितारा,
उम्मतियों के लिए जन्नत के मुख्तार आ गए हैं.
मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश
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