खुद के साये नात
खुद के साये की तरह छाई ये दुनिया हम पर,
जहन माऊफ़ कर डाला और हावी हो गए हम पर.
मैं उलझा इस तरह कि उलझने बढ़ती गयीं मेरी,
निभाने की कसम खाती और डोरे डालती हम पर.
दीन ईमां बन चुकी नादानी मे फानी दुनिया,
अगर तौबा ना की तो सजा वाजिब हुई हम पर.
ये हरजाई है नंबर वन भरोसा मत करो इस पर,
ये जालिम छा ही जायेगी कभी तुम पर कभी हम पर.
इलाही कर अता अक्ले सलीम इस नादान 'मुफ़लिस' को,
कि मिट जाए गलतफहमी व गफलत का असर हम पर.
- मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस'
मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश
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