काली घटायें नात
काली घटायें आक़ा की जुल्फों के सामने,
सारे दिए हों जैसे शोआओं के सामने.
डूबा हुआ सूरज आ गया वापस,
मजबूर था आक़ा के इशारों के सामने.
हजरत बिलाल ने दी जब काबे मे अजां,
सानी ना हुआ उनके अज़ानो के सामने.
इक इशारे मे हुआ दो टुकड़े चांद,
उंगली उठी जो सब की निगाहों के सामने.
मारके बद्र बातिल का शर्मिन्दा ख्वाब था,
सर झुक गए हैं झूठे खुदाओं के सामने.
कातिल ना बन सके उमर साहिबे ईमान हो गए,
माजूर हो गए आक़ा के इरादों के सामने.
मुनकर नकीर कब्र मे हो जाएगें खामोश,
'मुफ़लिस' के बिला खौफ जवाबों के सामने
- मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस'
मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश
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