दोजख़ की ना नात

दोज़ख की ना जन्नत की फिज़ा मांग रहा हूं, 
सरकार की कुरबत की दुआ मांग रहा हूं. 

हसनैन के सदके मे बुला लीजिए तैबा, 
आक़ा तेरे निस्बत की सज़ा मांग रहा हूं. 

मंगता हूं मांगता हूं दामन को पसारे, 
कुछ भी नहीं रहमत की सिवा मांग रहा हूं. 

शरमाया है मुफ़लिस का जिक्र व सजदा, 
रब तेरी अकीदत की रज़ा मांग रहा हूं. 

- मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस'
मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

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