उनकी अजमत को क्या नात

उनकी अजमत को क्या बताना है,
जिन पे कुदरत का शामियाना है. 

मुन्तजिर बा अदब फरिश्ते खड़े,
खास नालैन ही निशाना है. 

फर्श से अर्श तक पहुंचे कदम, 
कैसा अंदाज आशिकाना है. 

मिल के बैठे महबूब व मुहिब, 
जहां खालिक का आशियाना है. 

लब कुशाई हुई जो मूसा से, 
कहा अनमोल नमाजों का ये खजाना है. 

नमाजे लाए और लेके गए, 
कैसा मिलने का ये बहाना है 

रब व अहमद मे इम्तियाज नहीं, 
बारहा जाना और आना है. 

हद से आगे ना बढ़ सके ज़िब्रील, 
'मुफ़लिस' नाहक को पर जलाना है. 





- मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस'
मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

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