दिरसे कुरआं नात

दिरसे कुरआं मिला हमको मुहम्मद के घराने से, 
शरियत पा गयी परवान आँगन मे सिखाने से. 

मुहम्मद के वसीले से हुई पहचान खालिक की, 
वो होगी दूर गुमराही जो पनपी इक ज़माने से. 

ये है ऐलान कुरआं का मजहबे इस्लाम सच्चा है, 
सबक नायाब मोमिन को मिला रब के बताने से. 

अजल से ता अजल दुश्मने दीं हो गया शैतां, 
कयामत तक ना बाज आएगा वो वरगलाने से. 

अमल सालेह ही काम आएगा 'मुफ़लिस' मैदाने महशर मे, 
जो बहका बच नहीं सकता है वो दोज़ख मे जाने से. 

- मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस'
मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

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