बा हिजाब हुस्ने नात
बा हिजाब हुस्ने यूसुफ ना भाए,
बे हिजाब उनको देखा ना जाए.
चाह से ही निकलते बिके मिस्र मे,
बाद बिकने के क्यूँ हाय हाय.
गैर हालत हुई इक नजर मे,
सुकून जुलैखा को इक पल ना आए.
इश्क परवां चढा आम होता रहा,
चर्चा बन ही गया बिन बताए.
चाक दामन हुआ दर खुले खुद बखुद,
दाग हसमत पे लगने ना पाए.
रुख से पर्दा हटा कट गयीं उंगलियां,
मजहबीनों को कुछ ना सुझाए.
फन मुसव्विर की 'मुफ़लिस' नहीं इन्तेहा,
मिस्ल बे मिस्ल बनता ही जाए.
- मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस'
मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश
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