दोशंबा की नात

दोशंबा की सुबह सादिक नबी तशरीफ लाए थे. 
ज़माने मे अंधेरा था उजाला साथ लाए थे,
नयी सुबह लाए थे जिंदगी दिलाए थे दुनिया के सामने. 

मासूम जिंदा बच्चियों को सुपुर्द ए खाक करते थे, 
उनकी मिन्नत व माजरत नज़र अंदाज करते थे, 
नया सवेरा लाए थे बेटियाँ बचाए थे दुनिया के सामने. 

गुमराही उरुज पे थी हावी हो गया था शैतां, 
उसके नक्शे कदम पे चलके गुमराह हुआ इंसां,
नयी रोशनी लाए थे गुमराही मिटाए थे दुनिया के सामने. 

नफरत व जहालत शबाब पे थी जीना मुहाल था, 
मुफ़लिस' रास्ते खौफनाक थे चलना मुहाल था,
नया दौर लाए थे बद अमनी मिटाए थे दुनिया के सामने. 

- मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस'
मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

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