सज्दों के एवज नात

सज्दों के एवज फिरदौस मिले ये बात मुझे मंजूर नहीं,
बेलौस इबादत करता हूं बन्दा हूं तेरा मजदूर नहीं. 

मस्जिद हो या हो वीराना रब की इबादत लाजिम है, 
सज्दों की जगह जुजखाने खुदा क्या हरजा उसका जहूर नहीं.

फितरत के पुजारी होश मे आ इस दुनिया से रिश्ता टूटेगा, 
रब जिसको चाहे जिस हाल मे रक्खे मुख्तार है वो मजबूर नहीं. 

लुकमए अजल बनोगे 'मुफ़लिस' इस दाम से बचना नामुमकिन,
आमाल की अपने पाओ सज़ा वो वक्त भी आना दूर नहीं.

- मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस'
मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

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