नाज़ 'मुफ़लिस' को नात

नाज़ 'मुफ़लिस' को है मुफ़लिसी पे मगर, 
मालो जर पे है अपना भरोसा नहीं. 

इस अंबार दौलत पे नाजाँ ना हो, 
कब ये आयी गई कुछ भरोसा नहीं. 

अमीरी गरीबी का मजबूत रिश्ता, 
किसे क्या मिले कुछ भरोसा नहीं. 

गई कारून के साथ कौड़ी नहीं, 
सब यहीं रह गया कुछ भरोसा नहीं. 

आखिरत की है पूंजी अमल नेक 'मुफ़लिस'
फरेब दुनिया महज है भरोसा नहीं. 

- मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस'
मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

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