बलंदी पे अलम नात

बलंदी पे अलम ख्वाजा पिया का है सफ़ीने मे,
अकीदतमंद पाएं फैज हर दिन हर महीने मे. 

ज़माने को मुअत्तर कर दिया और कर गए पर्दा, 
महक वो आज भी बाकी है ख्वाजा के दफ़ीने मे. 

जमीने हिंद पे हर सिम्त बिखरे हैं सितारे भी, 
कमर के मिस्ल मखजन हैं वो राजस्थां के सीने मे. 

गरीब नवाज का दर है अदब लाज़िम है हम सब पर, 
जहन सहमा है गाफिल का बदन डूबा पसीने मे. 

ये वो दरबार है जिससे कोई खाली नहीं लौटा, 
नवाजह हर सवाली को कमी क्या है खजीने मे. 

जिये जाता है 'मुफ़लिस' खेलता मौजे हवादिस से, 
अकीदत का भरम रखलो तो आए लुत्फ जीने मे. 

- मुस्तफीजुल हक़ 'मुफ़लिस'
मझौवा तोग शाहपुर गोंडा उत्तर प्रदेश 

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