इबादत सा इश्क़, दुआ सा एहसास
मौन आँखों में चंद ख़्वाब
और होंठों पर दुआ लिए
अपनी हथेलियों से
तुम्हारे नन्हे हाथ टटोलते हुए,
तुम्हारी हर सांस महसूसते हुए,
हर लम्हा, हर घड़ी
रोज़ यूँ पढ़ता हूँ तुम्हें,
गोया
तुम हो इक नूरानी आयत,
और मैं बेकरार सा इबादतगुज़ार,
देखता हूँ तुम्हें, मगर
हर बार जैसे पहली दफा हो,
कभी माथे की पेशानी को चूमकर
तो कभी तुम्हारे नर्म गालों को सहलाकर,
ताबीज़ सा तुझे सीने से लगा लेता हूँ,
कि मेरी हर दुआ बस तुझ तक पहुँचे।
-आकिव जावेद

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