बड़े अब्बू: एक आखिरी सफर

आज सुबह जैसे ही फोन की घंटी बजी, दिल एक अजीब बेचैनी से भर गया। कॉल उठाते ही जो आवाज़ सुनी, उसने पैरों तले ज़मीन खींच ली—“बड़े अब्बू नहीं रहे…”

एक पल के लिए दिल ने यकीन ही नहीं किया। लगा जैसे कोई बुरा सपना देख रहा हूँ, जिससे अभी जाग जाऊँगा। लेकिन हकीकत का सामना तो करना ही था। बड़े अब्बू अब इस दुनिया में नहीं थे।

बड़े अब्बू सिर्फ एक रिश्ते का नाम नहीं थे, वो एक एहसास थे, एक साया थे, जो हमेशा हमारे साथ थे। जब भी कोई मुश्किल आई, उनका हाथ सिर पर हमेशा रहा। वो हमारे घर के बड़े थे, लेकिन उनकी मोहब्बत में कभी दूरी नहीं थी। उनका हर लफ्ज़, हर मुस्कान, हर दुआ आज भी कानों में गूंज रही थी।

आखिरी बार जब बड़े अब्बू से मिला था, तब उनकी तबीयत कुछ ठीक नहीं थी। लेकिन फिर भी, चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान थी। उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर कहा था, “बेटा, इंसान की पहचान उसके किरदार से होती है, दौलत से नहीं। हमेशा नेक काम करना, अल्लाह तुम्हें कामयाबी देगा।”

कौन जानता था कि ये उनकी आखिरी नसीहत होगी? आज उनकी वो बातें दिल के हर कोने में गूंज रही हैं। काश, मैं उनसे और बातें कर पाता, काश, उन्हें बता पाता कि वो हमारे लिए कितने अहम थे। लेकिन अब सब खामोश हो गया।

मुझे याद है जब मैं छोटा था, तो वो हमेशा अपने साथ शिकार पर लेके जाते थे, किस्से कहानियाँ सुनाते थे, जिंदगी के फलसफे समझाते थे। उनकी आँखों में हमेशा मेरे लिए प्यार और रहनुमाई होती थी। कभी डांटते भी, मगर वो डांट भी सिर्फ हमारी भलाई के लिए होती थी। 

मुझे वो दिन भी अच्छे से याद हैं जब हम दोनों साथ में शिकार के लिए जाते थे। बड़े अब्बू को शिकार का गहरा शौक था। कभी नदियों के किनारे, तो कभी तालाबों के पास, हम घंटों बैठकर इंतजार करते थे कि कब कोई शिकार हमारे जाल में फंसे। उनकी आँखों में तब जो जुनून और खुशी होती थी, वो कभी भूल नहीं सकता। वो कहते थे, “शिकार सिर्फ ताकत से नहीं, सब्र से किया जाता है।” ये बात शायद सिर्फ शिकार के लिए नहीं, बल्कि जिंदगी के लिए भी थी। आज वो मेरे साथ नहीं हैं, लेकिन उनकी वो सीख, वो लम्हे, हमेशा मेरी यादों में जिंदा रहेंगे।

जब उनकी हालत बिगड़ने की खबर मिली, तो बिना कुछ सोचे मैंने फौरन टिकट बुक कर लिया। दिल में बस यही ख्याल था कि किसी भी तरह बड़े अब्बू से मिल लूँ, उन्हें देख लूँ। लेकिन जब मैंने छुट्टी की बात की, तो मेरे हेड ने मना कर दिया। “हम मंथ एंड की तरफ़ बढ़ रहे हैं, अभी तुम्हें नहीं भेज सकते,” बस यही जवाब मिला। मैंने कोई लंबी छुट्टी नहीं मांगी थी, सिर्फ तीन दिन… बस तीन दिन का वक्त चाहिए था अपने बड़े अब्बू के आखिरी सफर में उनके साथ चलने के लिए। लेकिन ये भी नहीं मिला।

क्या करता? मजबूरी का ये आलम कि अपने ही घरवालों के ग़म में उनके पास जाकर रो भी नहीं सकता। ना चाहते हुए भी टिकट कैंसिल करना पड़ा। दिल पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा था। कितनी बेबसी थी उस पल… हाथ में सब इंतज़ाम था, लेकिन फिर भी मैं कुछ नहीं कर सकता था। इस परदेश की यही सबसे बड़ी तकलीफ है—अपने लोगों के लिए रोने का हक़ भी छिन जाता है। यहाँ से जाने का फैसला भी अपने हाथ में नहीं होता, जैसे हम अपने ही घर के मेहमान बन गए हों।

दिल में एक अजीब सी बेचैनी थी, आँखों से नींद गायब थी। ख्यालों में बस वही मंजर घूम रहा था—बड़े अब्बू का जनाज़ा उठ रहा होगा, घरवाले ग़म से टूटे हुए होंगे, और मैं यहाँ… दूर, बेबस, मजबूर। काश, मैं भी वहाँ होता, काश, उनके जनाज़े की नमाज़ में शामिल हो पाता, काश, आखिरी बार उनकी कब्र की मिट्टी को छू पाता। लेकिन ये काश… ये काश कभी पूरे नहीं होते।

अब बस दुआ ही कर सकता हूँ—“अल्लाह बड़े अब्बू की मगफिरत करे, उनके क़दमों को जन्नत की ओर आसान कर दे।” आमीन।



आकिव जावेद 

मझौवा तोग शाहपुर 


Comments

  1. आपका दर्द लफ्जों में महसूस किया जा सकता है… खुदा उन्हें जन्नत नसीब करे और आपको सब्र दे…

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  2. बहुत ही दुखद और भावनात्मक पोस्ट

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  3. बहुत ही गहरी लाइन - इस परदेश की यही सबसे बड़ी तकलीफ है—अपने लोगों के लिए रोने का हक़ भी छिन जाता है। यहाँ से जाने का फैसला भी अपने हाथ में नहीं होता, जैसे हम अपने ही घर के मेहमान बन गए हों।

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  4. आपके बड़े अब्बू मेरे भी बहुत करीब थे उनके साथ शिकार पर गुजारे हुए लम्हे ओर उनकी बातें हमेशा के लिए मेरे लिए बहुत खास रहेगी अल्लाह मरहूम मग़फिरत फरमाए

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  5. बहुत HARD लिख दिए हो भाई दिल को हर एक लाइन लगी है, एक लाइन पड़ता तो मन करता बस एक और ऐसे करते करते हर एक शब्द को पढ़ा, इसमें बहुत गहराई है मुझे लगता है आप के लेखों के आगे मेरे लेख का कोई मायना ही नहीं है♥️
    ( Allrounder qazi )

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