रामीन की पहली ईद—बिना उसके अब्बू के

कभी-कभी ज़िंदगी हमें ऐसे मोड़ पर ले आती है, जहाँ खुशियाँ भी अधूरी लगती हैं। आज वही एहसास मुझे अपनी रूह तक महसूस हो रहा है। मेरी जान, मेरी रामीन, आज तेरी पहली ईद है… और मैं तुझसे दूर हूँ। सोचता हूँ, क्या ये सच में ईद है? क्या ये वही दिन है, जिसका हर बाप अपने बच्चे के साथ इंतज़ार करता है?

27 जनवरी 2025 की वो रात जब मेरी दुनिया पूरी हो गई थी। जब मैंने तुझे पहली बार अपनी बाहों में उठाया था, तो लगा था जैसे वक्त ठहर गया हो, जैसे पूरी कायनात बस तेरा दीदार करने को रुकी हुई हो। तेरी नन्ही-नन्ही उंगलियाँ जब मेरी ऊँगली से लिपटी थीं, तब मैंने अपने रब से बस एक दुआ माँगी थी—कि कभी तुझसे दूर न जाऊँ। लेकिन आज, जब तेरी पहली ईद आई, तो मेरी ये दुआ अधूरी रह गई।

बेटा, मैं नहीं जानता कि तू इस वक्त क्या कर रही होगी। शायद तू अम्मी की गोद में हंस रही होगी, शायद कोई तेरी नन्ही हथेलियों में तेरी पहली ईदी रख रहा होगा। शायद तेरा नया लिबास तेरी मासूमियत से भी ज़्यादा चमक रहा होगा। और मैं…?

मैं यहाँ इस ऊँचे शहर की ऊँची इमारतों के बीच, अपने कमरे की खिड़की से आसमान को ताक रहा हूँ। कल रात जब ईद का चाँद देखा, तो दिल में एक अजीब सी हलचल हुई। यही चाँद तुझे भी देख रहा होगा न, बेटा? यही चाँद शायद मेरी बेचैनी का गवाह भी है।

कभी-कभी खुद से सवाल करता हूँ—क्या ये ज़िम्मेदारियाँ, ये दूरियाँ वाकई ज़रूरी थीं? क्या इस दुनिया की चकाचौंध उस रोशनी से ज़्यादा कीमती थी, जो तेरी मुस्कान से मेरे दिल में फैलती? क्या ये ज़रूरी था कि मैं तुझसे इतना दूर होता? क्या ये दुनिया की भागदौड़, ये दौलत इतनी बड़ी चीज़ थी कि उसने मुझसे मेरी पहली खुशी छीन ली? क्या एक बाप की मोहब्बत से बढ़कर भी कोई और फर्ज़ हो सकता है?

रामीन, मेरी रूह, मेरा दिल आज किसी वीराने में खो गया है। जब मैंने तुझे पहली बार गोद में लिया था, तो सोचा भी नहीं था कि तेरी पहली ईद मुझसे बिना पूछे, मुझसे बिना इजाज़त, मुझसे इतनी दूर चली जाएगी।

बेटा, मैं जानता हूँ कि तू बहुत छोटी है, तुझे मेरी याद नहीं आएगी। लेकिन मैं चाहता हूँ कि जब तू बड़ी हो और ये ब्लॉग पढ़े, तो तुझे एहसास हो कि तेरा अब्बू तुझसे कितना प्यार करता है।

ये जुदाई हमेशा के लिए नहीं है, मेरी जान। अगले साल जब ईद आएगी, तो मैं तुझे अपनी बाहों में उठाकर तेरा हाथ पकड़कर तुझे मस्जिद ले जाऊँगा। तुझे सबसे खूबसूरत कपड़े पहनाऊँगा, तेरे हाथों में ईदी रखूँगा, तेरा माथा चूमकर तुझसे कहूँगा—

“देखो बेटा, तेरी पहली ईद पर जो कमी रह गई थी, वो आज पूरी हो गई।”




- आकिव जावेद 

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