गाँव अब भी वहीं है - बस मैं बड़ा हो गया हूँ
सुबह की पहली किरण जैसे ही खेतों पर गिरती थी, मुर्गा आवाज़ देता था और अम्मी की आवाज़ आती — चल बेटा, नहाने जा, बोरिंग का पानी अभी ठंडा ठंडा लगेगा।
वो बोरिंग बस नहाने की जगह नहीं थीं, वो हमारी हँसी, शरारत और आज़ादी की पहली पाठशाला थी। कभी-कभी अम्मी नहलाने के बाद नारियल तेल लगाती थीं और बाल बनाती थीं — इतने प्यार से कि लगता था जैसे हर बाल को दुआओं से गूंथा जा रहा हो। आज इतने महंगे शैम्पू भी वो सुकून नहीं देते।और जब बोरिंग से नहा कर निकलते थे, तो बाहर बैठा शेरू पूँछ हिलाता मिलता था — घर का हमारा वफ़ादार कुत्ता, जो हर मेहमान को सूँघ कर आने देता था। वो भी तो हमारा ही हिस्सा था — बिना बोले, हमेशा साथ।
आंगन में फैली धूल, छप्पर की छत पे पड़ती बारिश, और दूर से आती अम्मी की आवाज़ — आ जा बेटा, रोटी ठंडी हो रही है। वो रोटियाँ बस खाना नहीं होती थीं, उनमें माँ का इंतज़ार और अब्बू की थाली में चुपचाप बैठ जाने वाला सुकून घुला होता था।
दोपहर में आँगन में बिछी चटाई, और अम्मी का कह देना — अब कुछ देर सो जा बेटा, पर नींद कहाँ आती थी? हम तो खिड़की से झाँकते रहते — कब गली में कोई दोस्त आवाज़ लगाए “चल मैदान चलते हैं, क्रिकेट की बारी है। खेल से लौटते वक्त अक्सर पैर छिल जाते, और अम्मी अपने दुपट्टे का इक कोना फाड़ कर बाँध देतीं। उनकी उँगलियों की वो गाँठ आज भी दिल पर बँधी है, कहती थीं, कुछ नहीं हुआ, मिट्टी के बच्चे हो तुम, जल्दी ठीक हो जाओगे।
शाम ढले अब्बू जब चारपाई पे बैठते, तो उनके पास जा कर बैठ जाना भी एक रिवाज़ था। चाय की प्याली लिए पूछते —आज स्कूल में क्या पढ़ाया मास्टर जी ने? और मैं, आधा याद, आधा बना बनाया सुनाता रहता। अब्बू मुस्कुराते और सिर सहला देते। उनके हाथों की वो रेखाएं आज भी मेरी किस्मत सी लगती हैं। और कभी-कभी अब्बू के साथ खेत तक जाना होता था — जहां बैल हांकते किसान, ट्रेकेटर से जोतते खेत, मिट्टी में सना बचपन और आसमान में उड़ती चीलें, सब मिलकर जैसे एक पूरी दुनिया बुनते थे। कभी-कभी अब्बू चुप रहते थे, लेकिन उनके साथ बैठ कर चुप रहना भी एक सुकून था जैसे कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं थी। वो खामोशी भी हमें समझ आती थी शायद उससे ज़्यादा सिखाती थी जितना कोई किताब नहीं सिखा सकती।
रात में छप्पर की छत के नीचे दादी की कहानियों में चाँद खिड़की से झाँकता, कभी राजा रानी, कभी चुड़ैल, कभी अल्लाह की रहमत — और हम डरते-डरते भी मुस्कुराते रहते। कहानी के बीच अगर नींद आ जाए, तो दादी अपने पल्लू से मच्छर भगाती रहतीं और हम निश्चिंत होकर उस छप्पर की छाया में सपनों में खो जाते।
अब जब शहर की ऊँची इमारतों में रहता हूँ, हर शोर में गाँव की वो शांत रात याद आती है जहाँ सिर्फ कीड़े मकौड़े अपनी बोली में लोरी सुनाते थे, जहाँ बिजली नहीं होती थी, फिर भी अंधेरा डराता नहीं था बल्कि सुकून भरा था। यहाँ मोबाइल की घंटी हर पल बजती है, लेकिन वहाँ एक पुकार ही काफी थी — अब्बू खेत से आ गए हैं या अम्मी रोटियाँ सेंक रही हैं वो आवाज़ें अलार्म से ज़्यादा असर करती थीं।
आज शहर की रौशनी में वो सुकून खो गया है। यहाँ सब कुछ है — पर वो मिट्टी की ख़ुशबू नहीं, वो माँ की पुकार नहीं, वो बिना घड़ी के चलता वक़्त नहीं।
शहर ने बहुत कुछ दिया, पर जो खोया वो लौटाया नहीं कभी। नाम, काम, रौशनी। ना माँ की वो ममता, ना अब्बू का वो सिर सहलाना, ना वो नीम की छांव, ना वो चारपाई पर बैठा बचपन।
गाँव अब भी वहीं है, शायद थोड़ा बदल गया है। पर मेरा बचपन वहीं बसा है — उसी आंगन में, उसी नीम के नीचे, जहाँ एक नन्हा आकिव अब भी इंतज़ार करता है… मेरे लौट आने का। गाँव के कच्चे रास्ते, नीम के पेड़ की छांव, और वो टूटी साइकिल — सब आज भी मेरी रूह में बसी है।
वो नीम का पेड़… अब नहीं है। पिछली बार गाँव गया था तो देखा — ज़मीन से उखड़ा पड़ा था, जैसे किसी ने बचपन की पूरी एक किताब फाड़ दी हो। वो पेड़ सिर्फ छाँव नहीं देता था, वो हमारी शामों की बैठकी था, गर्मियों का झूला, और सर्दियों की धूप का घर। पर अब वो जड़ से उखड़ गया है — जैसे वक़्त ने कह दिया हो, “अब बड़ा हो जा।” उस नीम के नीचे दादी बैठती थीं, अम्मी कपड़े सुखाती थीं, अब्बू वहीं से खेत देखा करते थे — अब वहाँ खालीपन है, और उस खालीपन की खामोशी बहुत कुछ कहती है। अब हर बार जब किसी पेड़ की छाँव देखता हूँ, तो वो नीम बहुत याद आता है। कभी लगता है वो गिरा नहीं, बस मुझसे रूठ गया है — कहता है, “तू कब से नहीं आया…”
अब जब भी कभी कोई बुज़ुर्ग साइकिल पर जाते दिखते हैं, मैं रुक जाता हूँ — मुझे लगता है जैसे मेरे साजन दादा होंगे, जो हर सोमवार बाज़ार वाले दिन पे चुरमुरी बाँटा करते थे — एक ही जेब से बच्चों को चुरमुरी, और बड़ों को दुआएँ देते थे। वो चुरमुरी नहीं, जैसे यादों की मिट्टी में लिपटी हुई ख़ुशबूदार मोहब्बत और दुआएँ थीं।
शायद इसीलिए… अब जब थक जाता हूँ तो आँखे बंद कर लेता हूँ, और ख्वाबो में वहीं लौट जाता हूँ — अपने गाँव, अपने बचपन, अपने अपनों के पास।
कभी फुर्सत में चलूँगा वहाँ, जहाँ अब भी मेरी अम्मी बिना किसी घड़ी के, शाम के खाने की तैयारी करती होगी।

इतनी खूबसूरती से गाँव की तस्वीर बयां की है, जैसे हर एक लम्हा मेरी आंखों के सामने ज़िंदा हो गया हो। दिल से सलाम है ऐसे एहसासात को
ReplyDeleteराकेश सिंह
शब्द नहीं मिलते बस इतना कहूंगा आपने सिर्फ़ गाँव को नहीं हमारी रूह को भी छू लिया है। वाह
ReplyDelete— Priyanshu
Mere pass likhne ko kuch nhi aapke aage aapne jo likha h wo jadu jaisa h mere aankh mai aansu aur sath mai dhadkan tez ho gya ye jadu nhi to kya h bas yhi duaa h aapko khus rho jahan bhi ho 🥺
ReplyDelete😔😔😔
ReplyDeleteBohot accha
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