तुम आई तो

तुम आई तो…
खामोश दीवारों ने भी बोलना सीख लिया,
जैसे घर को अब असली मायने मिले हों।

तुम आई तो…
समय ठहर गया कुछ पल के लिए,
जैसे खुदा भी तुम्हें देख मुस्कुरा रहा हो।

तुम आई तो…
दुआएँ हक़ीक़त में बदल गईं,
और मेरी हर थकी हुई रग में सुकून उतर आया।

तुम आई तो…
सपनों ने आँखों से बाहर झाँकना शुरू किया,
जैसे अब उन्हें यकीन हो गया हो कि मंज़िल मिल चुकी है।

तुम आई तो…
हर लम्हा नया लगने लगा,
हर साँस में एक अलग सी मिठास घुल गई।

तुम आई तो…
ज़िन्दगी ने पहली बार खुद पर नाज़ किया,
क्योंकि उसने मुझे तुम्हारे जैसा तोहफ़ा दिया।

रामीन 
तुम सिर्फ आई नहीं —
तुमने हमारी रूहों को नया रंग दिया है।
तुम्हारे होने से हर मौसम खुशनुमा है,
हर दिन ईद है,
हर रात सुकून की दुआ है।




— आकिव जावेद

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