दो पीढ़ियों का एक रिश्ता — अब्बू से मैं और मुझसे रामीन
कभी किसी तस्वीर से मोहब्बत हुई है? ये वही तस्वीर है — जहाँ एक अब्बू ने सिर्फ बच्चे को नहीं थामा, बल्कि उसका कल, उसकी हिफाज़त, उसकी पहचान सब कुछ अपनी बाँहों में बाँध लिया। चेहरे पर जो मुस्कान है, वो दुनिया की हर दौलत से बड़ी है। जब इस बच्ची ने अब्बू की बाँहों में आँखें खोलीं, वो कोई आम दिन नहीं था, उस दिन कायनात ने एक नयी तहज़ीब देखी — जहाँ एक नन्हा सा जिस्म, एक बड़ी सी छाँव में महफूज़ हो गया। उसके अब्बू ने उसे उठाया नहीं था, बल्कि अपना सबकुछ उसकी हथेली पर रख दिया था। उस बच्ची को अभी बोलना नहीं आता, पर उसकी नज़रें चीख-चीख कर कह रही हैं — जो ये सीना है, यही मेरा घर है, और यही मेरा क़िला। अब्बू का चेहरा थका हुआ नहीं, बल्कि तसल्ली से भरा है — जैसे कह रहा हो: “रामीन, तेरे आने से मेरी अधूरी ज़िंदगी मुकम्मल हो गई…” और इसी लम्हे के दरमियान, मैं — आकिव जावेद, आज Father’s Day पर अपने अब्बू, जावेद मजीद साहब के लिए लिखना चाहता हूँ। आप मेरी ज़िंदगी की सबसे मजबूत दीवार हैं अब्बू जो हर तूफ़ान को मुझसे पहले झेल गए। आपके साए ने मुझे परदेस में भी तनहा नहीं होने दिया। मैं जितना कुछ भी बन पाया हूँ, उ...