गाँव अब भी वहीं है - बस मैं बड़ा हो गया हूँ
कुछ जगहें हमारे साथ बड़ी नहीं होतीं, वो वहीं रुक जाती हैं जैसे मेरा गाँव, जहाँ वक़्त ठहरा है, और बचपन अब भी खिलखिलाता है। वो मिट्टी के घर जिनकी दीवारें गर्मियों में ठंडी और सर्दियों में गरम लगती थीं, अब सिर्फ याद में बसी हैं। वो दरवाज़ा जिसकी किवाड़ हर बार चूँ-चूँ करके खुलती थी, अब किसी नए मकान की खामोशी में गुम हो चुकी है। सुबह की पहली किरण जैसे ही खेतों पर गिरती थी, मुर्गा आवाज़ देता था और अम्मी की आवाज़ आती — चल बेटा, नहाने जा, बोरिंग का पानी अभी ठंडा ठंडा लगेगा। वो बोरिंग बस नहाने की जगह नहीं थीं, वो हमारी हँसी, शरारत और आज़ादी की पहली पाठशाला थी। कभी-कभी अम्मी नहलाने के बाद नारियल तेल लगाती थीं और बाल बनाती थीं — इतने प्यार से कि लगता था जैसे हर बाल को दुआओं से गूंथा जा रहा हो। आज इतने महंगे शैम्पू भी वो सुकून नहीं देते। और जब बोरिंग से नहा कर निकलते थे, तो बाहर बैठा शेरू पूँछ हिलाता मिलता था — घर का हमारा वफ़ादार कुत्ता, जो हर मेहमान को सूँघ कर आने देता था। वो भी तो हमारा ही हिस्सा था — बिना बोले, हमेशा साथ। आंगन में फैली धूल, छप्पर की छत...